मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है

हम जीवन में  वही प्राप्त करते है जिसके काबिल हैं. इस लिए अगर आप जीवन में कुछ भी पाना चाहते हैं तो आको यह सिद्ध करना होगा कि उसके काबिल आप हैं. जीवन में  कोई भी लक्ष्य किसी के लिए आसान और किसी के लिए कठिन नहीं होता. कोई लक्ष्य आपके लिए जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल अन्य लोगों के लिए भी होगा. अब निर्भर आप पर करता है कि आप उस लक्ष्य को पाने के लिए कितना प्रयास कर रहे हैं. अगर आप कड़ी मेहनत और समर्पण के साथ अपने लक्ष्य को पाने के लिए आगे बढ़ते हैं तो धीरे-धीरे वह लक्ष्य भी आपके लिए आसान हो जायेगा. 

कई बार लोग बड़े लक्ष्य बनाते हैं और उन्हें प्राप्त करने की कोशिश करते हैं. पर उस लक्ष्य के लिए जितना ज्यादा कड़ी मेहनत और समर्पण की जरुरत है. उतना नहीं करते हैं. परिणाम यह होता है कि उन्हें हार का सामना करना पड़ता हैं. ऐसे में लोग या सोच कर कि यह मेरी किस्मत में नहीं, उसे छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं. पर सच यह है कि आपने उतना प्रयास किया  ही नहीं, जितने प्रयास की आवश्यकता थी. आप अपने भाग्य का  निर्माण स्वयं करते हैं और अगर आप ठान लेते हैं कि किसी मुकाम में पहुँचाना हैं, तो आप निश्चय ही उस मुकाम को प्राप्त करेंगे. 


उदहारण के लिए अगर को स्टूडेंट्स RBI ग्रेड B ऑफिसर भर्ती को अपना लक्ष्य बनता है पर वह क्लर्क या PO स्तर की तैयारी करता है तो वह RBI ग्रेड B में कैसे सफल हो पायेगा. ऐसे में किस्मत को दोष देने का मतलब सिर्फ इतना है कि आप तैयारी में रह गई कमी पर पर्दा डालने का प्रयत्न कर रहे हैं. अगर आपकी तैयारी क्लर्क और PO स्तर की थी तो आपको उसी में सफलता मिलेगी.  क्लर्क और PO आपका भाग्य है जिसको आपने बनाया हैं. अब यह प्रश्न उठता है कि भाग्य का निर्माण कैसे किया जाए? जिसका जवाब हम यहाँ देंगे.


सबसे  पहली बात यह समझना है कि आप किसे अपना लक्ष्य बना रहें हैं. क्योंकि जितना बड़ा लक्ष्य होगा उसमें सफलता प्राप्त करने के  लिए उतनी अधिक मेहनत करनी पड़ेगी. तो सबसे पहले लक्ष्य निर्धारित करिए और कड़ी मेहनत कीजिये. जब आप किसी competitive exam में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो उसके  लिए सबसे जरुरी है कि आप सबसे पहले उसके प्रति खुद को समर्पित कर दें और जितना अधिक हो सके अभ्यास करें. कई बार कुछ लोगों को लगता है कि उनका दिमाग कमजोर है और वह किसी परीक्षा में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते हैं. ऐसे में उन्हें निराश होने कि जरुरत नहीं है बल्की अधिक से अधिक अभ्यास करना चाहिए. इस दोहे में कहा भी गया हैं -

करत करत अभ्यास के जङमति होत सुजान,
रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान।


अर्थात जैसे रस्सी को बार-बार पत्थर पर रगङने से पत्थर पर निशान पड़ सकता है वैसे निरंतर अभ्यास से कम बुद्धि वाला व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है.
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