क्या अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध विश्व को मंदी की ओर धकेल रहा है?

पिछले कुछ समय में अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध में और अधिक वृद्धि हुई है। 20 अगस्त, 2019 को अमेरिकी प्रशासन ने 300 बिलियन डॉलर मूल्य के आयात पर दो चरणों में 15 प्रतिशत टैरिफ लागू करने के अपने निर्णय को अधिसूचित किया। टैरिफ वृद्धि के इस नवीनतम संस्करण का अर्थ है कि अमेरिका ने चीन से आयातित लगभग सभी उत्पादों पर टैरिफ लगा दिया है। दवा (फार्मास्युटिकल) आयात इसका एकमात्र बड़ा अपवाद है।

अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी अधिसूचना के तुरंत बाद ही चीन ने भी अमेरिका से आयातित 75 बिलियन डॉलर मूल्य के 5,000 से अधिक उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा कर दी। उसने कृषि और वानिकी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लक्षित किया। पहली बार कच्चे तेल पर भी टैरिफ में वृद्धि की गई। 2 सितंबर, 2019 को चीन ने अपनी प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई को और आगे बढ़ाते हुए विश्व व्यापार संगठन (WTO) में अमेरिका के एकतरफा टैरिफ वृद्धि के विरुद्ध शिकायत भी दर्ज करा दी।
आरंभ में अमेरिकी प्रशासन ने मुख्य रूप से चीन द्वारा अमेरिकी कंपनियों के बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के उल्लंघन को लेकर उसे लक्षित किया था। अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया था कि बीजिंग इन कंपनियों को उनके स्वामित्व वाली प्रौद्योगिकी हस्तांतरित करने के लिये दबाव डाल रहा था। वस्तुतः इस विषय में अमेरिका ने स्वयं ही सब कुछ तय कर लिया जहाँ एक ओर उसने चीन पर "ज़बरन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण" के लिये दबाव डालने का आरोप लगाया तो वहीं दूसरी ओर, वर्ष 1974 के व्यापार अधिनियम के प्रावधानों का उपयोग करके चीन के आयात के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधान लागू कर दिये।
इस अधिनियम के प्रावधान (जैसे धारा 301) अमेरिका को किसी भी ऐसे देश की "जाँच" की अनुमति प्रदान करते हैं, जिन्हें वह अमेरिकी कंपनियों के बौद्धिक संपदा अधिकारों के उल्लंघन का दोषी मानता हो। यदि जाँच में किसी देश को "दोषी" पाया जाता है तो उल्लंघन करने वाले देश पर व्यापार प्रतिकार या प्रतिशोध (Trade Retaliation) की कार्रवाई जा सकती है। चीनी उत्पादों के विरुद्ध अमेरिकी टैरिफ में वृद्धि व्यापार प्रतिशोध की ऐसी ही एक कार्रवाई के समान है।
यह उल्लेख किया जाना भी आवश्यक है कि धारा 301 की कार्रवाई WTO नियमों का उल्लंघन है क्योंकि विवादों को इस संगठन के विवाद निपटान तंत्र (Dispute Settlement mechanism) द्वारा ही हल किया जाना चाहिये।

‘करेंसी मैनिपुलेटर’ का लेबल

इस तनाव को और बढ़ाते हुए अमेरिकी प्रशासन ने न केवल बहुपक्षीयता की भावना का उल्लंघन किया है, बल्कि उसने अपने लक्ष्य को भी स्थानांतरित किया है। इस बार यह विवाद तब और बढ़ गया जब अमेरिका के ट्रेज़री सचिव ने ‘Omnibus Trade and Competitiveness Act’ की धारा 3004 के प्रावधानों को लागू किया।
यह धारा ट्रेज़री सचिव को इस परीक्षण के लिये अधिकृत करती है कि क्या अमेरिका के व्यापारिक भागीदार "भुगतान समायोजन के प्रभावी संतुलन के निषेध अथवा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अनुचित प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्यों से विनिमय की दर" में हेरफेर कर रहे हैं।
इससे पूर्व अमेरिका के ट्रेजरी सचिव ने अमेरिका के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार चीन पर ‘करेंसी मैनिपुलेटर’ (Currency Manipulator) अर्थात् ‘मुद्रा में हेरफेर करने वाला’ होने का आरोप लगाया।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1994 के बाद पहली बार वाशिंगटन ने किसी देश के विरुद्ध इस लेबल का इस्तेमाल किया है।
अमेरिका के ट्रेज़री सचिव द्वारा चीन की यह लेबलिंग पिछले वर्ष अमेरिकी कॉन्ग्रेस के समक्ष प्रस्तुत एक रिपोर्ट पर आधारित थी जिसमें यह निष्कर्ष दिया गया था कि चीन की "विनिमय दर प्रक्रियाओं में (विदेशी मुद्रा बाज़ारों में इसके हस्तक्षेप सहित) लगातार पारदर्शिता का अभाव रहा है", यद्यपि रिपोर्ट से यह भी पता चला कि पिछले कई माह से "पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना द्वारा विदेशी मुद्रा बाज़ारों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप" सीमित ही रहा है। अमेरिकी ट्रेज़री विभाग के अनुसार, "विदेशी मुद्रा बाज़ार में दीर्घकालिक और वृहत पैमाने पर हस्तक्षेप के माध्यम से एक अवमूल्यित मुद्रा को सहयोग देने के लंबे इतिहास के चलते" चीन को यह लेबल दिया गया।

करेंसी मैनिपुलेटर

  • मुद्रा के साथ छेड़छाड़ वह स्थिति होती है जब सरकारें व्यापार में "अनुचित" लाभ हासिल करने के लिये विनिमय दर को कृत्रिम रूप से मोड़ने की कोशिश करती हैं।
  • उदाहरणतः यदि चीन का केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाज़ार से अधिक मात्रा में डॉलर खरीदता है तो उसकी मुद्रा कृत्रिम रूप से कमज़ोर हो जाएगी और चीनी वस्तुएँ अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में काफी सस्ती हो जाएंगी जिसके कारण चीन को "अनुचित" लाभ प्राप्त होगा।
  • अब एक अमेरिकी फ़ोन का उदाहरण लेते हैं जिसकी मांग भारत में काफी ज़्यादा है, क्योंकि उसकी गुणवत्ता काफी अच्छी है, परंतु यदि कोई चीनी कंपनी भारत में वैसा ही फ़ोन निर्यात करती है तो चीनी मुद्रा की कीमत कम होने के कारण वह फ़ोन भारत में काफी सस्ता होगा और विवेकशील भारतीय उपभोक्ता चीनी मोबाइल फ़ोन को ही वरीयता देगा।
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