आरबीआई ने ऋणपत्र(डेब्ट) में निवेश करने हेतु एफपीआई के लिए मानदंडों को आसान बनाया

    ·        भारतीय रिजर्व बैंक ने अधिक विदेशी निवेश आर्किषत करने के उद्देश्य से ऋणपत्र या बांड, विशेषकर बड़ी निजी कंपनियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए निवेश नियम आसान कर दिए हैं।

·        इससे एक तरफ रुपए की गिरावट को थामने में मदद मिलेगी तथा कॉरपोरेट बांड की हालिया गिरावट से भी उबरने में मदद मिलेगी।
·        रिजर्व बैंक ने सरकारी प्रतिभूतियों में एफपीआई के लिए निवेश की सीमा उस सरकारी प्रतिभूति के बचे शेयरों के 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दी है।
·        हालांकि एफपीआई के लिए कॉरपोरेट बांड में अल्पावधि के निवेश के लिए अधिकतम सीमा 20 प्रतिशत ही रखी गई है यानी यह एफपीआई के कॉरपोरेट बांडों में कुल निवेश का 20 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।

ऋणपत्र क्या है?

ऋणपत्रों से कम्पनी दीर्घकालीन ऋण प्राप्त करती है इसमें कम्पनी निवेशको को एक निश्चित प्रतिशत पर प्रतिवर्ष ब्याज देती है चाहे कम्पनी को लाभ हो या नहीं। जब कम्पनी को पूंजी की आवश्यकता होती है तब कम्पनी ऋणपत्र जारी करके पूंजी प्राप्त करती है या हम शेष कह सकते हैं कि ऋणदाता कम्पनी को ऋण देता है और कम्पनी उस ऋण की एक रसीद ऋणपत्र के रूप में प्रदान करता है ऋणदाता को कम्पनी मे प्रबंध या मताधिकार नहीं होता।

ऋणपत्र से लाभ-

1.     ऋणपत्र सुरक्षित ऋण है 
2.     समता अंशधारी एवं पूर्वाधिकारी अंशधारी से पहले ऋणपत्रधारियों को कम्पनी समापन की दशा में भुगतान किया जाता है। 
3.     लाभ-हो या हानि ऋणदाताओं को दबाव दिया जाता है। 
4.     ऋणपत्रधारी प्रबंध पर हस्तक्षेप नहीं करते। 
5.     ऋणपत्रो पर दिया गया दबाव कम्पनी व्यय मानती है। 

ऋणपत्र की सीमायें- 

1.     ऋण कंपनी के पास स्थार्इ सम्पित्त्ा नहीं होती ऋणपत्र का निर्वचन नही  कर सकती। 
2.     ऋणपत्र कम्पनी के उधार लेने की क्षमता को कम कर देता है।

ऋणपत्रों के प्रकार-


1.     शोधनीय  एवं अशोधनीय ऋणपत्र-ऋणपत्र जिनकी धन वापसी एक निश्चित तिथी पर होती है शोधनीय ऋणपत्र है और समापन की दशा में निम्न ऋणपत्रों का करती है अशोधनीय ऋणपत्र है।

2.     परिवर्तनीय या अपरिवर्तित ऋणपत्र-जिन ऋणपत्रों को समता अंश में बदलने का अधिकार दिया जाता है पर परिवर्तनीय ऋणपत्र है और जिन ऋणपत्रों को समता अंश में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं दिया वह अपरिवर्तनीय ऋणपत्र है।


3.     सुरुरक्षित या असुरुरक्षित ऋणपत्र-सुरक्षित ऋणपत्रों को कम्पनी अपनी सम्पित्त के प्रभार के रूप में निर्गमित करती है असुरक्षित ऋणपत्र जो सम्पित्त के बिना प्रभार पर केवल भुगतान वापसी की शर्त पर निर्गमित करती है।

4.     पजीकृत एवं वाहक ऋणपत्र-जब ऋणपत्र धारियों को ऋणपत्र नियोजन करते समय पंजीकृत करके ऋणपत्र देती है वह पंजीकृत ऋणपत्र है जो ऋणपत्र सुपुदर्गी मात्र से हस्तान्तरित किया जा सकता है वह वाहक ऋणपत्र है।

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